punar janam kaise hota hai



👉पुनर्जन्म एक भारतीय मान्यता है जिसमें जीवात्मा के जन्म और मृत्यु के बाद पुनर्जन्म की मान्यता को स्थापित किया गया है। विश्व के सब से प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद से लेकर वेद, दर्शनशास्त्र, पुराण , गीता, योग आदि ग्रंथों में पूर्वजन्म की मान्यता का प्रतिपादन किया गया है। इस मान्यता के अनुसार शरीर का मृत्यु ही जीवन का अंत नहीं है परंतु जन्म जन्मांतर की श्रृंखला है। ८४ लाख योनियों में जीवात्मा अपने धर्म को प्रदर्शित करता है, आत्मज्ञान होने के बाद श्रृंखला रुकती है, जिस को मोक्ष के नाम से जाना जाता है। फिर भी आत्मा स्वयं के निर्णय, लोकसेवा, संसारी जीवों को मुक्त कराने की उदात्त भावना से भी जन्म धारण करता है। पुराण से लेकर आधुनिक समय में भी पुनर्जन्म के विविध प्रसंगों का उल्लेख मिलता है।


इंसान मरने के बाद कैसे होते हैं पुनर्जन्म?


तत्र बुद्धिमान्नास्तिक्यबुद्धिं जह्याद् विचिकित्सां च । कस्मात् ? प्रत्यक्षं हाल्पमः अनल्प मप्रत्यक्षमस्ति , यदागमानुमानयुक्तिभिरुपलभ्यते ; पैरेव तावदिन्द्रिपैः प्रत्यक्षमुपलभ्यते , तान्येव सन्ति चाप्रत्यक्षाणि 

पुनर्जन्म का विचार करना हो तो सर्वप्रथम बुद्धिमान पुरुष के लिए उचित है कि वह नास्तिक की बुद्धि और शमशेर बुद्धि को त्याग दें जो कि प्रत्यक्ष ज्ञान करने योग्य अवस्थाएं कम है और अप्रत्यक्ष वस्तुएं बहुत है।


जिनको प्राप्ति आगम अनुमान और युक्ति प्रमाण से होती है। यदि केवल प्रत्यक्ष को ही प्रमाण माना जाए तो वह दूसरा दोष आ जाएगा कि जिन इंद्रियों से प्रत्यक्ष ग्रहण होता है वह स्वयं अप्रत्यक्ष है।



प्रत्यक्ष ज्ञान में बाधा हेतु-


¤ चक्षुरिंद्रिय से ग्राह्य रुप वाली वस्तुओं के रहने पर भी


•अत्यंत समीप होने के कारण।


•अत्यंत दूर होने के कारण।


• मन में चंचल होने के कारण


•सभी हार एक समान की वस्तुएं।


•किसी अन्य वस्तु से दब जाने के कारण


•अत्यंत सूक्ष्म होने के कारण उस वस्तु का प्रत्यक्ष नहीं होना


•आवरण से ढक जाने के कारण


•इंद्रियों की दुर्बलता के कारण



¤ माता-पिता को जन्म के कारण मानने वाला पक्ष की शंका समाधान।


यह श्रुतियां भी पुनर्जन्म को ना मानने के कारण नहीं है। क्योंकि युक्ति विरोध होता है।


• संतान उत्पत्ति में यदि माता-पिता की संतान उत्पत्ति में आत्मा का प्रवेश संतान में होता है तो दोनों की आत्मा संतान में संचार करती है तो दोनों की मृत्यु हो जाने चाहिए।


• यदि अव्यव रूप से आत्मा का प्रवेश संतान में माना जाए तो आत्मा के सूक्ष्म अवयव का कहीं शास्त्र में उल्लेख नहीं मिलता क्योंकि वहां तो नीरवयव तथा सूक्ष्म होता है।


आ. गंगाधर अनुसार- संतान में माता-पिता के मन और बुद्धि का संचार होता है।


👉"बुद्धिर्मनश्च निर्णीते यथैवात्मा तथैव ते । येषां चैषां मतिस्तेषां योनिास्ति चतुर्विधा" । । 


प्रकारांतर से समाधान- बुद्धि और मन के संबंध में यह निर्णय हो चुका है कि यह दोनों आत्मा की भांति है। तथा एक है जिनकी (माता-पिता संतान की उत्पत्ति में कारण होता है। ) ऐसी बुद्धि (धारणा) है उनके मत में चार प्रकार की योनियों, नहीं हो सकती इसलिए केवल माता-पिता को संतान की उत्पत्ति में कारण मानना उचित नहीं है।


👉"विद्यात्स्वाभाविकं षण्णां धातूनां यत् स्वलक्षणम् । संयोगे च वियोगे च तेषां कर्मेव कारणम् "॥


स्वभाववादी की शंका का उत्तर-शरीर और जगत् को धारण करने वाले छह धातुओं के जो अपने लक्षण हैं ; जैसे — पृथिवी का काठिन्य आदि , जल का द्रवता आदि , अग्नि उष्णता , वायु का तिर्यग्गमन आदि , आकाश का अप्रतीपात आदि तथा आत्मा के ज्ञान आदि - उन्हें स्वाभाविक जानना चाहिए , परन्तु इनके ( छह धातुओं के ) संयोग और वियोग में कर्म ही कारण है ।



अनादेश्चेतनाधातोर्नेष्यते परनिर्मितिः । पर आत्मा स चे तुरिष्टोऽस्तु परनिर्मितिः ॥ १३


परनिर्माणवादी के पक्ष में दोष - जो अनादि चेतना धातु है , उसका दूसरे द्वारा निर्माण नहीं हो सकता । यदि पर शब्द से परमात्मा मानें , तो ऐसी स्थिति में परनिर्माण मानने में कोई आपत्ति नहीं है ।


• ऐसा मानने पर जन्म जन्मातरो के कर्मो से सम्बंधित पुनर्जन्म को स्वीकार करने मे कोई आपत्ति नही होती हे।


न परीक्षा न परीक्ष्यं न कर्ता कारणं न च । न देवा नर्षयः सिद्धाः कर्म कर्मफलं न च । 


यदृच्छावादी के मत में दूषण — समस्त सृष्टि यदृच्छा द्वारा ही होती हे । इसमे और कोई कारण नहीं हे । यदृच्छा में प्रमाणों द्वारा कोई परीक्षा नहीं है और न परीक्षा का काई विषय है । उनके मत में न कर्ता है , न कारण है , न देव है , न ऋषिगण है , न सिद्ध है ना कर्म है , न कर्मफल है । यदृच्छावाद से उसकी आत्मा दब गई है , इसलिए वह आत्मा को नहीं मानता । । इस नास्तिक मत को मानना सब पापों से बड़ा पाप है


•सत्य असत्य की परीक्षा का निर्देश- इसिलिए विवेकशील पुरुष को चाहिये की वह आमार्गप्रसृत अपनी इस मती को छोडकर ,सत्पुरुषो के बुद्धिरुपी प्रदीप से समस्त शास्त्रीय विषयों का ठीक ठीक रुप से विचार करे।

हमेशा इस बात का ध्यान रखते हैं जिस प्रकार आम का फल से कभी अमरूद के पेड़ नहीं बनेंगे जिस प्रकार अमरूद के फल से आम के पैर नहीं बनेंगे ठीक उसी प्रकार इंसान की आत्मा इंसान ही बनते हैं यह आत्मा अमर है इसे कोई नहीं मार सकता है यह आत्मा ईश्वर ने बनाया है इसलिए इसकी विनाश नहीं है ।  यह आत्मा की कर्म पर निर्भर करते हैं उनके जन्म किस जगह कहां और कैसे होगी । 

इंसान के पिछले जन्म के बात कभी याद नहीं रहता है यदि किसी इंसान के याद हो तो यह विधि के विरोध है क्योंकि विधि ने कभी किसी चीज को एक समान नहीं रखे हैं एक ना एक दिन उसे समाप्त होना ही है ।

इसलिए जो परमात्मा है वही सब जीवात्मा को कंट्रोल करते हैं उनकी पिछले जन्म की याद कभी नहीं आएगी यदि ऐसा हुआ तो बहुत मुसीबत सकती है कभी इंसान अपने इंसान नहीं समझेंगे अपने को परमात्मा समझेंगे । 

पर हां जो आत्मा कठोर तपस्या किया करते थे पहले उन्हें अगले जन्म में क्या होने वाले हैं यह सब कुछ तपस्या के बल पर पता कर लेते थे अभी भी ऐसा आदमी है जो कठोर तपस्या करने के बाद वह भविष्य में क्या होने वाले हैं सब कुछ पता कर लेते हैं ।

इंसान मरने के बाद उन्हें फिर से इंसान के रूप में जन्म लेना ही है क्योंकि उनकी जो कर्म  के फल भुगतना ही है इसलिए परमात्मा ने सब कुछ हिसाब किताब लिखकर उन्हें फिर से इस पृथ्वी लोक में जन्म करने की अधिकार देते हैं ।

पुनर्जन्म होने का प्रमाण क्या है ?

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युक्ति प्रमाण द्वारा पुनर्जन्म की सिद्धि - पुनर्जन्म को सिद्ध करने में यह युक्ति है कि षडधातु ( पञ्च महाभूत और आत्मा ) के समूह से गर्भ का जन्म होता है । क्योंकि कर्ता और कारण के परस्पर संयोग से क्रिया ( किसी कार्य की सम्पादिका ) होती है । कृत ( किये हुए ) कर्म का ही फल मिलता है न कि अकूत ( न किये हुए ) कर्म का । बीज के बिना कभी भी अंकुर की उत्पत्ति नहीं होती और कर्म के अनुरूप ही फल भी होता है । बीज के बिना अंकुर की उत्पत्ति नहीं होती , यह युक्ति भी पूर्वोक्त विषय को ही समर्थन देती है । दूसरा दृष्टिकोण यह भी प्रस्तुत करती है कि यदि अंकुर की उत्पत्ति हुई है तो इसके मूल । में बीज अवश्य होगा , ऐसा हम अनुमान भी कर सकते हैं , क्योंकि एक ( प्रत्यक्ष ) बीज को बो करके हम । कुछ ही दिन में अंकुर को देखते हैं । इसी से प्रत्यक्ष का अनुमान से और अनुमान का युक्ति से सुस्थिर सम्बन्ध सिद्ध होता है।


चतुर्विध परीक्षा का उपसंहार - यही चतुर्विध परीक्षा है । इसके अतिरिक्त और कोई परीक्षा नहीं है । जिससे सभी प्रकार के ( पूर्ववर्णित ) सत् और असत् परीक्षा करने योग्य विषयों की परीक्षा की जा सकती है । उस परीक्षा से ही पुनर्भव ( पुनर्जन्म ) के अस्तित्व को स्वीकार किया जाता है चार प्रमाणों द्वारा जब यह निश्चय हो गया है कि पुनर्जन्म होता ही है , तो वह सुख हो इसके लिये धर्म - द्वारों का उपदेश दिया गया है । मनुष्य के जीवन को मूलतः चार भागों में विभक्त किया पाहै । यथा - १ . ब्रह्मचय , २ . गृहस्थाश्रम , ३ . वानप्रस्थ और ४ . सन्यास ।

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