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 दोस्तों आपको क्या कहेंगे जिसने मातृभूमि की सेवा के लिए अपने ऐसो आराम की नौकरी ठुकरा दी दोस्तों आप उन्हें क्या करेंगे जिसने अपनी sathi के जान के बदले अपनी जान कुर्बान कर दी । दोस्तों आप उन्हें क्या कहेंगे जिस ने मात्र 24 साल की उम्र में हम सब भारतवासियों को जीत का जश्न मनाने का मौका दिया । बेशक वह वीरो का वीर कम भी नहीं होगा ।  जी हां दोस्तों आज की दास्तां है सन 1999 में लड़ी गई लड़ाई में अपनी महारत दिखाने वाले भारतीय फौज की एक जांबाज जिसे दुनिया परमवीर कैप्टन विक्रम बत्रा के नाम से जानती है । आज इस वीरगाथा को सुनते हुए आंखें नाम तो होंगी लेकिन सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा यह बात है आज से करीब 20 साल पहले 1999 के कारगिल युद्ध की पाकिस्तानी घुसपैठ के कारण हुए थे । 




और नदी के किनारे एक रेस्टोरेंट्स में अपने दोस्तों के साथ बैठे हुए थे इन्हीं बातों बातों में उनकी किसी दोस्त ने कहा कि विक्रम कारगिल में जंग शुरू हो चुकी है थोड़ा संभल के रहना । उनका जवाब था तुम फिकर मत करो मैं वहां तिरंगा झंडा गाड़ के आऊंगा या फिर उसी तिरंगे में लिपट के आऊंगा आऊंगा जरूर । जरा सोचिए जिसकी जुबां पर ऐसे अंगारे रखते हो उसके दिलो-दिमाग में राष्ट्रप्रेम किस कदर कूट-कूट कर भरा होगा । जल्द ही भारत के इस वीर की बायोपिक बॉलीवुड के बड़े पर्दे पर दिखाई जाएगी  । budu में आगे बढ़ते हुए आइए हम आपको हिमाचल प्रदेश के एक छोटे से गांव मालनपुर में ले चलते हैं । जहां 9 सितंबर 1974 को दो जुड़वा बच्चों का जन्म हुआ मां ने बड़े प्यार से बड़े वाले का नाम लव और छोटे का नाम खुश रखा । उन दिनों किसे पता था कि सिर्फ 24 वर्ष की आयु में इस दुनिया को छोड़कर चले जाने वाला वह भी सदा सदा के लिए लोगों के दिलों में अमर हो जाएगा ।  विक्रम को शुरू से ही लाइफ में कुछ अलग करने का जुनून था कि 1997 में उन्हें मर्चेंट नेवी से नौकरी की कॉल आई थी घर पर सब बहुत ही खुश थे । हांगकांग में नौकरी और फ़ौज से करीबन 3 गुना ज्यादा सैलेरी का ऑफर में था।  लेकिन अपने देश के लिए कुछ करने की इच्छा रखने वाले विक्रम हमेशा से आर्मी जाने की इच्छा जाहिर की और 6 दिसंबर 1997 को विक्रम बत्रा ने भारतीय सेना के अफसर के तौर पर शपथ ली । जब युद्ध छेड़ा तो फौज में लेफ्टिनेंट विक्रम को सिर्फ 18 महीने ही हुए थे उन्हें अपने यूनिट के साथ उत्तर प्रदेश में शाहजहांपुर रिपोर्ट करने का आदेश मिला । लेकिन आखिरी लम्हों में निर्देश आया कि उन्हें कारगिल जा रहा है कारगिल जाने से पहले विक्रम ने अपनी मां से बात की । मां को मन ही मन थोड़ी घबराहट तो हुई लेकिन अपने मातृभूमि की रक्षा करने का अवसर भी तो सिर्फ नसीब वालों को ही मिलता है यह सोच विक्रम को आशीर्वाद देते हुए विदा किया । उधर दूसरी तरफ युद्ध भीषण रूप ले चुका था पाकिस्तानी लिमिटेड की फोटो पर कब्जा कर के बैठे हुए थे उन चट्टानों पढ़ाई करना जहां ऊपर से दनादन गोलियां बरस रहे हो और अपने की कोई जगह तक ना हो यह सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं सलाम है ऐसे भारत के वीरों को जिन्होंने मौत की परवाह किए बगैर खून की आखिरी बूंद तक मातृभूमि का कर्ज अदा किया ।

Vikram batra


दोस्तों स्टोर लोडिंग की भैया वह आया जिंदगी गुजारी थी करीबन 16508 दुश्मनों की चोटियों पर कब्जा कर के बैठे हुए थे भारतीय फौज के लिए पलटवार करना काफी मुश्किल साबित हो रहा था करीब 10 दिन के बाद यह जिम्मेवारी सौंपी गई कई दिनों के बाद जब 13 जून को तिरंगा लहराया उसको 7 जवान और एक अवसर के रूप में चुकानी पड़ेगी ।.

तो लोडिंग में जो कुछ चल रहा था उसे सुन सुनकर लेफ्टिनेंट विक्रम और उनकी फौज जंग के आदेश के लिए छटपटा रहे थे 19 जून को दिन था जब विक्रम बत्रा और कैप्टन संजीव जामवाल tuton की कमान सौंपकर जंग में उतरने का फरमान सुनाया गया और एक बेहद कठिन नामुमकिन सा प्रतीत होने वाला मिशन का ऐलान कर दिया गया टारगेट था प्वाइंट 5 पॉइंट 40 घोर अंधेरी रात में  500 मीटर खड़ी चढ़ाई उस पर से हथियारों के साथ आज करीबन 20 किलो से भी ज्यादा का वजन दोस्तों खतरा है यह था कि अगर सुबह होने से पहले चढ़ाई पूरी नहीं हुई तो फिर दुश्मनों की नजर से बचना नामुमकिन था भारतीय जवान दुश्मनों के काफी करीब पहुंच गए चोटी के तरफ से दुश्मनों पर ले लेफ्टिनेंट बत्रा की पुकार का हार बनकर बरसी बत्रा सबसे पहले एक बड़े से में ग्रेनेड फेंककर आमने-सामने के जंग का ऐलान कर दिया दोनों तरफ से भयंकर गोलीबारी हुई । दुश्मनों का पनकर धू धू जलने लगी तने के जंग का ऐलान कर दिया दोनों तरफ से भयंकर गोलीबारी हुई दुश्मनों के pankaj budu करके चलने लगे इस बॉक्सर की दिलेरी देख सैनिकों का जोरदार मार रहा था उस अंधेरी रात में पहाड़ की चोटी गोली बारूद की रोशनी में जगमगा उठती है यहां तक कि लेफ्टिनेंट बत्रा ने बिना बंदूक के हैंड टू हैंड फाइटिंग में चार दुश्मनों को ऊपर पहुंचा दिया जब विक्रम बत्रा ने प्वाइंट 5140 कैप्चर किया तब उनके कमांडर ने पूछा कि फतेह मिलने पर विक्रम कैसा महसूस कर रहे हो जीत की जोश में विक्रम बत्रा ने जवाब दिया सर यह दिल मांगे मोर यह बेमिसाल जीत की तस्वीरें समूचे देश ने देखी आर्मी चीफ ने बात की और भूमि पर ही विक्रम बत्रा का प्रमोशन हो गया कैप्टन विक्रम बत्रा हो गए दोस्तों एक फौजी के लिए इससे बड़ा सम्मान और क्या ही हो सकता है मातृभूमि की रक्षा करने का एक और सुनहरा अवसर कैप्टन विक्रम और उनकी टीम को नसीब हुआ सामने था मिशन दूसरी टीमों के साथ विक्रम बत्रा की टीम भी रवाना हुई ।  निकलने से पहले उन्होंने आखिरी बार मां से बात करते हुए कहा था कि मैं एकदम फिट हूं तो फिकर मत करना । तेज बुखार से जूझ रहे कैप्टन विक्रम बत्रा को युद्ध में ना जाने की सलाह दी गई थी । उस समय बर्फबारी हो रही थी उसी खराब मौसम में तेज बुखार से jal रहे बदन को आग के शोलों में तब्दील कर अपने साथियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ने का निर्णय लिया । सैनिकों ने जैसे ही यह खबर सुनी कि कैप्टन विक्रम मिशन पर जा रहे हैं उनका जोश कई गुना बढ़ गया कारगिल की आधी जीत तो तभी लिखी जा चुकी थी । पॉइंट 4875 पहाड़ी की चढ़ाई दम खड़ी थी करीबन 80 डिग्री का श्लोक उसका और काली रात में भारी बर्फबारी हो रही थी चढ़ाई नामुमकिन सा प्रतीत हो रहा था लेकिन विक्रम बत्रा तो मानो पाकिस्तानियों का यमराज बन कर आए थे ।  शेरशाह के नाम से दीक्षा कैप्टन विक्रम बत्रा उजाला होने से पहले 3 घंटे isar को खामोश कर दिए । अचानक कैप्टन बत्रा की आंखों ने एक घायल सिपाही को देखा जो मुश्किल से खुद को दुश्मन के फायरिंग से बचा पा रहा था कैप्टन बत्रा ने अपने कमांडर सूबेदार रघुनाथ सिंह की ओर रुख किया और उन्होंने बोला कि आप और मैं दोनों मिलकर इसे सुरक्षित स्थान पर ले जाएंगे जैसे ही सूबेदार मेजर रघुनाथ सिंह विक्रम बत्रा से एक कदम आगे निकलना चाहा तभी कैप्टन विक्रम बत्रा ने उनके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा रघुनाथ तू बाल बच्चे वाला है मैं वेट करूंगा तुम सिर्फ कवर फायर दो इतना कह कर कैप्टन विक्रम बत्रा आगे निकल गए वहीं कैप्टन विक्रम बत्रा से बाहर निकले दुश्मन की एक गोली सीधे उनके सीने में जा लगी । मानो युद्ध भूमि की दहाड़ को उस भयानक पल का सन्नाटा निकल गया हो जैसे सीने में दी गई हो लेकिन फिर भी आखरी सांस तक उन्होंने गोलियां बरसाना बंद नहीं किया । परमवीर कैप्टन विक्रम बत्रा वही घुटनों के बल बैठ कर चलाते रहे गोलियां । यह देख भारतीय सिपाहियों में ऐसा गुस्सा आया कि पूरी की पूरी पहाड़ की चोटियां दुश्मनों को Lal करते हुए भारत माता के वीर सपूत के बाद  पाकिस्तानी  को आग के हवाले करते चले गए । गोली बारूद की आवाज भारत माता की जीत हिंदुस्तान की झोली में गिरी चोटी पर तिरंगा मानो के साथ रात के ठीक 18 दिन बाद शूरवीर कैप्टन विक्रम बत्रा अमर रहेगा हमारे सम्मान में हमारी आजाद हवाओं में कश्मीर की आजाद पहाड़ियों में भारत के स्वर्णिम शौर्य गाथाओं में और हर एक हिंदुस्तानी के दिलों में । दोस्तों आपको क्या लगता है परमवीर कैप्टन विक्रम बत्रा की जीवनी पर बनने वाली यह फिल्म बॉक्स ऑफिस के अब तक के सारे रिकॉर्ड तोड़ पाएगी हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं 


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